एनीमेलिया जगत (Kingdom Anemalia)

एनीमेलिया जगत (Kingdom Anemalia)

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  • एनीमेलिया बहुत ही बड़ा जगत है। इस वर्ग में बहुकोशिकीय, यूकैरियोटिक जीवों को रखा गया है। ये जीव प्रायः चलायमान होते हैं, और इनकी कोशिकाओं में कोशिकाभित्ती नहीं पाई जाती है। ये जीव विषमपोषी होते हैं। विषमपोषी में भी पोषण के अलग-अलग तरीके पाये जाते हैं, जैसे कुछ जीव शाकाहारी होते हैं (खरगोश), और भोजन के लिए केवल पादपों का प्रयोग करते हैं कुछ जीव केवल मॉसभोजी (शेर) होते हैं, और मात्र मॉस से ही अपना पोषण प्राप्त करते हैं, कुछ जीव दूसरे जीवों पर परजीवी (कृमि) की तरह रहते हैं। कुछ जीव मरे हुए जीवों को भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं (गिद्ध), तो कुछ जीव अपना शिकार स्वयं करना पसंद करते हैं (बाज, शेर)। इसी तरह इनके आवास में भी विभिन्नता पाई जाती है, कुछ जीव थल में निवास करते हैं (मनुष्य) तो कुछ जीव जल में निवास करते हैं (मछली), कुछ ऐसे भी जीव हैं जो थल और जल दोनों में निवास करने के लिए अनुकूलित होते हैं (मेढक)। कुछ जीवों में उड़ने की क्षमता होती है (पक्षी), अधिकांश जीव अपने बाहुओं का प्रयोग करके चलते हैं (मनुष्य, कुत्ता), कुछ जीवों में चलने के लिए पैर नहीं होते तो वे रेंगते हैं (सॉप) तो कुछ जीव चल भी नहीं सकते और आजीवन एक ही स्थान पर बने रहते हैं(स्पंज)। ऐसी ही अनेक विभिन्नताओं के कारण एनीमेलिया के अध्ययन के लिए इसका पुनः वर्गीकरण आवश्यक है, जिससे एक ही वर्ग के जीवों के बीच समानता अधिक हो, असमानता कम। एनीमेलिया का वर्गीकरण अनेक आधारों पर किया जा सकता है, इसको वर्गीकृत करने के लिए व्हिटेकर ने मुख्य रूप से शारीरिक

एनीमेलिया का वर्गीकरण (Classification of Anemalia)

(1) पोरीफेरा (Porifera)

  • जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस समूह के जीवों का शरीर छिद्र युक्त होगा।
  • ये अधिकांशतः खारे जल में रहने वाले जीव हैं, अर्थात ये समुद्री या महासागरीय जीव हैं।
  • इन जीवों में प्रचलन की क्षमता नहीं होती, अर्थात ये पूरा जीवन पादपों की तरह एक ही स्थान पर स्थिर रहकर व्यतीत करते हैं।
  • एक ही स्थान पर चिपके रहने के कारण ये अपनी सुरक्षा के लिए भाग नहीं सकते, अतः सुरक्षा की दृष्टि से इनके शरीर पर एक बाह्य कठोर आवरण होता है।
  • इनमें नाल तंत्र पाया जाता है, जो इनकी समस्त शारीरिक क्रिया (श्वसन, पोषण, उत्सर्जन, परिसंचरण) के लिए जवाबदेह होता है।
  • इनका शरीर अत्यंत सरल प्रकार का होता है, इनमें ऊतक एवं अंगतंत्र विभेदित नहीं होता।
  • इनका शरीर द्विपार्श्वसम्मित नहीं होता।
  • पोरीफेरा के जीवों को किसी भी अक्ष से काटने पर उनका शरीर दो बराबर भागों में नहीं बॅटता है।
  • ये जीव पृष्ठधारीय नहीं होते।
  • उदाहरण- यूप्लैक्टेला (इसे वीनस की पुष्प मंजूसा के नाम से भी जाना जाता है), साइकॉन आदि।

नोट- द्विपार्श्वसम्मित शब्द उन जीवों के लिए प्रयोग में लाया जाता है, जिनके शरीर को बीच से दो भागों में काटने पर उनके शरीर का बॉया और दॉया भाग समरूप अर्थात एक सा होता है। जैसे- मनुष्य को बीच से दो भागों में काटने पर उसकी बॉयी तरफ भी एक आँख, एक कान, एक हाथ, एक पैर, आधी नाक और आधा मुँह होगा और दायाँ तरफ भी एक आँख, एक कान, एक हाथ, एक पैर, आधी नाक और आधा मुँह होगा। अतः मनुष्य द्विपार्श्वसम्मित होता है।

(2) सीलेन्ट्रेटा (Coelenterata)

  • इस वर्ग में भी जलीय जीवों को रखा गया है, इनमें से कुछ स्वच्छ जल में पाये जाते हैं (जैसे-स्वच्छ जल हाइड्रा)और कुछ समुद्री जल में पाये जाते हैं (जैसे- कोरल)
  • इनमें से कुछ जीव चलायमान होते हैं (जैसे हाइड्रा) और कुछ जीव आजीवन एक ही स्थल पर बने रहते हैं (जैसे-कोरल)
  • कुछ जीव अकेले निवास करते हैं (जैसे हाइड्रा) और कुछ जीव समूहों में रहते हैं (जैसे-कोरल)
  • इन जीवों का शरीर कोशिकाओं की दो स्तरों का बना होता है (आंतरिक स्तर और बाह्य स्तर), और कोशिकाओं की दोनों स्तरों के बीच देहगुहा होती है।
  • कोरल मरने के पश्चात उनके शरीर का कठोर आवरण समाप्त नहीं हो पाता। नए कोरल पुराने कोरल के अवशेषों पर ही वृद्धि करने लगते हैं, इस प्रकार कोरल का बहुत ही बड़ा अंबार खड़ा हो जाता है, जिसे कोरल रीफ कहते हैं।
  • हाइड्रा के शरीर को बीच से काट देने पर यह मरता नहीं है बल्कि काटे हुए टुकड़ों की संख्या के बराबर नए हाइड्रा बन जाते हैं।
  • उदाहरण- कोरल, हाइड्रा, जैली फिश, समुद्री एनीमोन आदि।

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