भारत की जलवायु

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भारत की जलवायु

  • एक विशाल क्षेत्र में लंबी समयावधि में मौसम की अवस्थाओं तथा विविधताओं का कुल योग ही जलवायु है। मौसम एक विशेष समय में एक ही क्षेत्र के वायुमंडल की अवस्था को बताता है।
  • किसी भी क्षेत्र की जलवायु को नियंत्रित करने वाले छःप्रमुख कारक हैं-अक्षांश, ऊँचाई, वायुदाब एवं पवन तंत्र, समुद्र से दूरी, महासागरीय धाराएँ एवं उच्चावच लक्षण।

मानसून

  • मानसून शब्द की व्युत्पत्ति अरबी शब्द मौसिम से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ है-मौसम। मानसून का अर्थ, एक वर्ष के दौरान वायु की दिशा में ऋतु के अनुसार परिवर्तन है।

मानसून की उत्पत्ति

मानसून की प्रक्रिया को समझने के लिए निम्नलिखित तथ्य महत्त्वपूर्ण हैं

  • तापीय संकल्पना-– स्थल एवं जल के गर्म एवं ठंडे होने की विभेदी प्रक्रिया के कारण भारत के स्थल भाग पर निम्न दाब का क्षेत्र उत्पन्न होता है, जबकि इसके आस-पास के समुद्रों के ऊपर उच्च दाब का क्षेत्र बनता है।
  • गतिक संकल्पना– फ्लोन के अनुसार ग्रीष्म ऋतु के दिनों में अंत: उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र की स्थिति गंगा के मैदान की ओर खिसक जाती है। (यह विषुवतीय गर्त है जो प्रायः विषुवत् वृत से 5° उत्तर में स्थित होता है)। इसे मानसून ऋतु में मानसून गर्त के नाम से भी जाना जाता है।

अंत: उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र

ये विषुवतीय अक्षांशों में विस्तृत गर्त एवं निम्न दाब का क्षेत्र होता है। यहीं पर उत्तर-पूर्वी तथा दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनें आपस में मिलती हैं। यह अभिसरण क्षेत्र विषुवत वृत्त के लगभग समानान्तर होता है, लेकिन सूर्य की आभासी गति के साथ-साथ यह उत्तर या दक्षिण की ओर खिसकता है।

  • सूर्य के उत्तरायण होने पर उत्तरी अभिसरण सीमा 30° उत्तरी अक्षांश तक विस्तृत हो जाती है। इस स्थानान्तरण के कारण भारतीय उपमहाद्वीप का अधिकांश भाग विषुवतीय पछुआ पवनों के प्रभाव में आ जाता है, जो दक्षिणी-पश्चिमी मानसून कहलाता है।
  • शीत ऋतु में वायुदाब एवं पवन पेटियाँ दक्षिण की ओर स्थानांतरित हो जाती हैं, जिससे इस प्रदेश में उत्तर-पूर्वी व्यापारिक पवनें स्थापित हो जाती है। इन्हें उत्तर-पूर्वी मानसून कहते हैं।

जेट धारा सिद्धांत

जेट धारा

ये एक सँकरी पट्टी में स्थित क्षोभमंडल में 12000 मीटर से अधिक ऊँचाई वाली पश्चिमी हवाएँ होती हैं (इनकी गति गर्मी में 110 कि. मी. घंटा एवं सर्दी में 184 किमी/घंटा होती है।) बहुत सी अलग-अलग जेट धाराओं को पहचाना गया है। उनमें सबसे स्थिर मध्य अक्षांशीय एवं उपोष्ण कटिबंधीय जेट धाराएँ हैं।

  • शीत ऋतु में हिमालय तथा तिब्बत के पठार के द्वारा उपस्थित अवरोध के कारण जेट धारा दो शाखाओं में बँट जाती हैउत्तरी शाखा हिमालय तथा तिब्बत के पठार के उत्तर में तथा दक्षिणी शाखा इनके दक्षिण में बहती है। जेट धारा के दक्षिण में अफगानिस्तान तथा उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान के ऊपर निर्मित उच्च दाब के कारण उत्तर-पश्चिमी भारत के ऊपर वायु नीचे बैठती है।
  • ग्रीष्म ऋत में ध्रुवों के ऊपर धरातलीय उच्च दाब क्षीण पड़ जाता है तथा ऊपरी वायुमंडलीय परिध्रवीय भँवर उत्तर की ओर खिसक जाता है। जेट धारा के तिब्बत के पठार के उत्तर की ओर खिसकने से उपमहाद्वीप के उत्तरी तथा उत्तरी पश्चिमी भाग के ऊपर मुक्त वायु के प्रवाह के वक्र का उत्क्रमण हो जाता है। उत्तरी ईरान एवं अफगानिस्तान के ऊपर एक गत्यात्मक गर्त (Dynamic depression) विकसित हो जाता है जो पहले से धरातल पर स्थापित तापीय गर्त के ऊपर स्थित होता है। यह परिघटना एक ट्रिगर का कार्य करती है, जिससे मानसून का विस्फोट (Burst of monsoon) होता है।

महासागरीय राशियों

  • जब दक्षिण प्रशांत महासागर के उष्ण कटिबंधीय पूर्वी भाग में उच्च दाब होता है तब हिंद महासागर के उष्ण कटिबंधीय पूर्वी भाग में निम्न दाब होता है, लेकिन कुछ विशेष वर्षों में वायुदाब की स्थिति विपरीत हो जाती है। दाब की अवस्था में इस नियतकालिक परिवर्तन को दक्षिणी दोलन (Southern Oscillation) कहते हैं। दाब की अवस्था का सम्बन्ध एलनीनो से है। इसलिए इस परिघटना को एसो (ENSO) (एलनीनो दक्षिणी दोलन) (Elnino Southern Oscillation) कहा जाता है।

एल नीनो ( EInino)

  • ठंडी पेरू जलधारा के स्थान पर अस्थाई तौर पर गर्म जलधारा के विकास को एल नीनो कहते हैं। यह स्पैनिश शब्द है जिसका अर्थ होता है बच्चा जो कि बेबी क्राइस्ट को व्यक्त करता है, क्योंकि यह धारा क्रिसमस के समय बहना शुरू करती है।

ला नीना (La nina )

  • ला नीना, एल नीनो की विपरीत घटना है जिसमें पूर्वी तथा मध्यवर्ती प्रशांत महासागर का जल सामान्य से अधिक ठण्डा होता है।

मौसम की दशाएं

भारतीय मौसम विभाग ने वर्ष को चार ऋतुओं में बाँटा है

  1.  शीत ऋतु (मध्य दिसंबर से मध्य मार्च तक)
    2. उष्ण शुष्क (ग्रीष्म ऋतु) (मध्य मार्च से जून तक)
    3. आर्द्र (वर्षा) ऋतु (मध्य जून से सितम्बर तक)
    4. लौटते हुए मानसून की ऋतु (अक्टूबर से मध्य दिसम्बर तक)

1. शीत ऋतु : 

  • भूमध्य भाग क्षेत्रों में उत्पन्न विक्षोभों के कारण उत्तर भारत में हल्की वर्षा होती है। साथ ही कश्मीर एवं हिमालय में भारी हिमपात भी होता है।
  • उत्तर-पूर्वी मानसून के कारण शीत ऋतु में तमिलनाडु के कोरोमण्डल तट पर भी वर्षा होती है।

2. ग्रीष्म ऋतु :

  • ग्रीष्म ऋतु में दाव तथा पवन संचार अस्थिर होता है।
  • इस समय देश के विभिन्न भागों में स्थानीय पवनें बहती हैं
  • लू – उत्तरी मैदान में शुष्क गर्म पवनें।
  • नार्वेस्टर (काल बैसाखी)-पश्चिम बंगाल एवं असम में गरज के साथ वर्षा होती है।
  • मैंगो शावर (आग्न वां)– कर्नाटक एवं केरल में पूर्व-मानसूनी वर्षा, जिससे आम जल्दी पक जाते हैं।

3. वर्या ऋत:

प्रायद्वीप की आकृति के कारण मानसूनी पवनें दो भाग में बँट जाती हैं–

  • i. अरब सागरीय शाखा-इसकी एक शाखा पश्चिमी घाट से टकाराकर वहाँ भारी वर्षा करती है तथा दूसरी शाखा सौराष्ट्र एवं कच्छ के तटों को पार करके पश्चिमी राजस्थान एवं अरावली के ऊपर पंजाब और हरियाणा में पहुँचती है।
  • ii. बंगाल की खाड़ी की शाखा-यह म्यांमार के अराकन तट से टकराकर गारो और खासी के मुख्य मार्ग में प्रवेश करती है। चेरापूँजी (1087 सेमी.) तथा मॉसिनराम (1141 सेमी.) भारत में अधिकतम वर्षा प्राप्त करते हैं।

कोपेन का जलवायु वर्गीकरण

  • कोपेन ने भारत को तीन जलवायवीय प्रदेशों में बाँटा-शुष्क, अर्द्ध शुष्क तथा आर्द्र। ये प्रदेश तापमान एवं वर्षा के मौसमी अन्तरों के आधार पर पुनः उपविभाजित किए गए।
क्र.सं. जलवायु का प्रकार क्षेत्र
1 उष्ण कटिबंधीय सवाना प्रकार कर्क रेखा के दक्षिण में प्रायद्वीपीय पठार का अधिकतम भाग
2 लघु शुष्क ऋतु वाला  मानसूनी प्रकार मालाबार तट, कोंकण तट एवं गोवा के दक्षिण में
3 शुष्क ग्रीष्म ऋतु वाला मानसूनी प्रकार तमिलनाडु का कोरोमण्डल तट
4 अर्द्धशुष्क स्टेपी जलवायु उत्तर-पश्चिमी गुजरात, पश्चिमी राजस्थान और पंजाब के कुछ भाग
5 उष्ण मरुस्थल प्रकार राजस्थान का सुदूर पश्चिमी थार मरुस्थलीय भाग, उत्तरी गुजरात एवं हरियाणा का दक्षिणी भाग
6 शुष्क शीत ऋतु वाला मानसूनी प्रकार गंगा का मैदान, पूर्वी राजस्थान, उत्तरी मध्य प्रदेश, उत्तर पूर्वी भारत का अधिकांश भाग
7 लघु ग्रीष्म तथा ठण्डी आर्द्र शीत ऋतु जलवायु प्रदेश अरुणाचल प्रदेश
8 ध्रुवीय प्रकार की जलवायु जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड

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