वैश्विक तापन Global Warming

वैश्विक तापन Global Warming

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  • ग्रीन हाउस गैसों के बढ़ते सान्द्रण के कारण वैश्विक तापन (Global Warming) में वृद्धि हो रही है। वैश्विक तापन औद्योगिकीकरण के साथ प्रारम्भ हुआ था, लेकिन इसकी तापन दर में उतार-चढ़ाव आता है। वैश्विक तापन में अवशोषित (Absorb) ऊर्जा अवरक्त किरणों (Infrared Rays) के रूप में वापस परावर्तित होती है, इसमें से कुछ विकिरण वायुमण्डलीय गैसों द्वारा अवशोषित हो जाती हैं और इस तरह आने वाली कुल ऊर्जा का सम्पूर्ण भाग वापस अन्तरिक्ष (Space) में नहीं पहुंचता है। वैश्विक तापन ग्रीन हाउस गैसों मुख्यतः कार्बन डाइ-ऑक्साइड, मीथेन और कार्बन मोनो ऑक्साइड गैसों द्वारा होता है, जिससे वायुमण्डल गर्म हो जाता है।

वैश्विक तापन के प्रभाव

  1. बर्फ का पिघलना वैश्विक तापन के कारण ध्रुवों पर जमी बर्फ एवं अन्य ग्लेशियरों के पिघलने से पर्यावरण एवं जैव-विविधता प्रतिकूल रूप से प्रभावित होती है। बर्फ के पिघलने से दोहरी समस्या उत्पन्न होती है। पहले तो बाढ़ आती है तथा बाद में सूखे की स्थिति निर्मित होती है। नासा (National Aeronautics and Space Administration, NASA) के आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2003 से 2008 के बीच अण्टार्कटिका, ग्रीनलैण्ड व अलास्का से लगभग 20 खरब टन बर्फ का पिघलाव हो चुका है।
  2. समुद्र तल का ऊपर उठना समुद्र तल का ऊपर उठना हिमनदियों के पिघलने से पैदा हुआ उप-प्रभाव है, क्योंकि पिघला हुआ हिम अन्ततः नदियों आदि से होता हुआ सागर तक पहुँचकर उसके जल तल में वृद्धि कर देता है। वर्ष 1993 से 2003 के बीच समुद्र तल में 3 मिमी की दर से वृद्धि हुई है।
  3.  महासागरीय धाराओं में परिवर्तन वैश्विक तापन के कारण महासागरीय जल के तापमान, लवणता तथा घनत्व आदि में बदलाव आता है। इससे महासागरीय धाराओं की गति, दिशा व आकार प्रभावित होते हैं। जब धाराओं का वर्तमान प्रवाह चक्र बाधित होगा, तो वैश्विक ऊष्मा स्थानान्तरण की प्रक्रिया भी बाधित होगी और तटीय देशों की जलवायु में भी बदलाव होगा।
  4. जातियों के वितरण एवं जैव-विविधता पर प्रभाव प्रत्येक जाति एक विशिष्ट प्रकार के वातावरण से अनुकूलन स्थापित करके अपना जीवन चक्र  पूरा करती है, परन्तु भूमण्डलीय तापमान के बढ़ने से जीवों का भौगोलिक वितरण प्रभावित हो सकता है, इससे विभिन्न जातियों का विस्थापन प्रारम्भ हो सकता है।
  5. खाद्यान्न उत्पादन पर प्रभाव तापमान में वृद्धि से पौधों में कई रोग एवं पीड़क जन्तु, खरपतवार एवं श्वसन क्रिया की दर में वृद्धि हो जाती है, जिस कारण फसलों का उत्पादन कम हो जाता है। तापमान में 1°C वृद्धि से केवल दक्षिण-पूर्व एशिया में चावल उत्पादन करीब 5% गिर सकता है। अत: कार्बन डाइऑक्साइड में वृद्धि पूरे विश्व में खाद्यान्न उत्पादन की समस्या को बढ़ा देगी।
  6. मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव जीवाणुओं तथा विषाणुओं के प्रकोप में वृद्धि होगी, क्योंकि अधिक ताप में इनकी क्रियाशीलता बढ़ जाएगी, जिस कारण रोगों के संचार में वृद्धि शुरू हो जाएगी, अभी जो बीमारियाँ उष्णकटिबन्धीय क्षेत्रों में हैं, उनका विस्तार शीतोष्ण कटिबन्ध में भी हो सकता है। डेंग मलेरिया, प्लेग, पीलिया, श्वसन सम्बन्धी एवं चर्म रोगों (Skin Disease) में वृद्धि होगी। मानव स्वास्थ्य पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से विस्थापित आबादी पर्यावरण शरणार्थी (Environmental Migrants) कहलाएगी।
  7. जलवायु पर प्रभाव उपोष्ण कटिबन्धीय (Sub-tropical Zone) क्षेत्रों में वर्षा 0.3% प्रति दशक की दर से कम हुई है। इसके साथ ही अतिवादी घटनाओं; जैसे—बाढ़, सूखा आदि की बारम्बारता में पर्याप्त वृद्धि हो सकती है।

वैश्विक ऊष्मन क्षमता

  • किसी गैस की वैश्विक ऊष्मन क्षमता से तात्पर्य किसी निश्चित समय के दौरान (प्रायः सौ वर्ष) कार्बन डाइऑक्साइड और उस गैस द्वारा अवशोषित ऊर्जा की तुलनात्मक माप है। कार्बन डाइऑक्साइड की वैश्विक ऊष्मन क्षमता 1 मानी गई है, जोकि अन्य गैसों की वैश्विक ऊष्मन क्षमता के मापन हेतु आधार रेखा का कार्य करती है। किसी गैस की वैश्विक ऊष्मन क्षमता जितनी अधिक होगी, वह प्रति पौण्ड उतनी ही अधिक ऊर्जा अवशोषित करेगी और पृथ्वी के गर्म होने में अधिक योगदान देगी।

वैश्विक ऊष्मन के सन्दर्भ में ग्रीन हाउस गैसों की क्षमता/प्रभाव का मापन दो आधारों पर किया जाता है।

  1.  कोई भी गैस कितनी ऊष्मा को अवशोषित कर उसे अन्तरिक्ष में जाने से रोक सकती है।
  2.  कोई भी गैस कितने लम्बे समय तक वायुमण्डल में बनी रहती है।

वैश्विक तापन को नियन्त्रण करने के उपाय

वैश्विक तापन को नियन्त्रण करने के उपाय निम्नलिखित हैं।

  • ग्रीन हाउस गैसों का स्राव, जीवाश्म ईंधन का कम उपयोग तथा ऊर्जा के अन्य स्रोतों-पवन ऊर्जा, सौर्य ऊर्जा आदि का उपयोग बढ़ाना चाहिए। इसके अतिरिक्त पृथ्वी पर वानस्पतिक क्षेत्र खासकर वनों को बढ़ाएँ, जिससे CO, का उपयोग प्रकाश संश्लेषण में हो जाएगा।
  • खेती में नाइट्रोजन खादों का उपयोग कम करें, जिससे NO, का उत्सर्जन कम होगा। क्लोरो फ्लोरो कार्बन के प्रतिस्थापित पदार्थों का विकास करना। उपरोक्त न्यूनीकरण विधियों के अतिरिक्त स्थानीय जलवायु परिवर्तन के साथ सामंजस्य होना आवश्यक है।

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