राजस्थान के प्रमुख लोक संत

rajasthan ke pramukh lok sant

राजस्थान के प्रमुख लोक संत

rajasthan ke pramukh lok sant

संत जाम्भोजी : विप्नोई सम्प्रदाय

  • विश्नोई सम्प्रदाय के प्रवर्तक जाम्भोजी थे इनका मूल नाम धनराज था ।
  • जन्म सन् 1457 ईस्वी में जन्माष्टमी के दिन नागौर जिले के पीपासर गाँव में हुआ ।
  • इनके पिता का नाम लोहर जी व माता का नाम हंसादेवी था ।
  • इन्होने विश्नोई समाज की धर्म प्रतिष्ठा हेतु 29 नियम बनाये थे । जाम्भोजी को पर्यावरण प्रेम के कारण पर्यावरण वैज्ञानिक के रूप में माना जाता है । इनको गहला व गूंगा उपनाम से जाना जाता है ।
  • सन् 1485 में इन्होने समराथल (बीकानेर) में विश्नोई समुदाय की स्थापना की ।
  • सन् 1528 में इन्होने मुकाम गाँव (बीकानेर) में समाधि ली ।
  • विश्नोई सम्प्रदाय जाम्भेजी को विष्णु का अवतार मानता है । वे स्थान जहाँ पर जाम्भोजी उपदेश दिया करते थे संथारी कहलाते है।
  • इन्होने धर्म प्रकाश, जन्म संहिता, जम्मसागर शब्दावली की रचना की ।
  • जाम्भोजी के आठ धाम इस प्रकार है । 1. पीपासर (नागौर) 2. रामड़ावास (जोधपुर) 3. मुकाम (बीकानेर) 4. लालसर (बीकानेर) 5. जाम्भा (जोधपुर) 6. रोटू (नागौर) 7. जागलू (बीकानेर) 8. लोदीपुर (मुरादाबाद UP)

संत जसनाथजी : जसनाथ समादाय

  • संत जसनाथ जी का जन्म 1482 ईस्वी में कतियासर बीकानेर में हुआ । इनका लालन-पालन हम्मीर य रूपादे द्वारा किया गया ।
  • इस सम्प्रदाय के लोग 36 नियमों का पालन करते है । इस सम्प्रदाय के ये अनुयायी जो इस संसार से विरक्त हो जाते है, परमहंस कहलाते है।
  • इस सम्प्रदाय के अनुयायीयों द्वारा धधकते अंगारों पर नृत्य किया जाना है जिसे अग्नि नृत्य कहा जाता है यह बीकानेर जिले का प्रसिद्ध है ।
  • जसनाथ जी के उपदेश सिंभूदना एवं कौडा ग्रन्थ में संग्रहित है । इस सम्प्रदाय की पाँच पीठे निम्न है – 1. पोचला (नागौर) 2. मालासर (बीकानेर) 3 पूरनासर (बीकानेर) 4. बमल (बीकानेर) 5. लिखमादेसर (बीकानेर)

संत दादूदयाल जी

  • इनका जन्म 1544 में अहमदाबाद गुजरात में है । इनकी कर्मभूमि एवं साधना भूमि राजस्थान रही । ऐसा माना जाता है कि दादू दयाल जी लोदीराम नामक व्यक्ति को नदी में बहते हुए सन्दुक में मिले थे ।
  • दादू जी की शिष्य परम्परा में 152 शिष्य माने जाते है । जिनमें 52 प्रमुख शिष्य थे जो 52 स्तम्म कहलाते है ।
  • दादू जी के उपदेशों की भाषा संघकड़ी भाषा थी । दादू जी ने प्रथम उपदेश 1568 में सांभर में दिया ।
  • सन् 1574 में इन्होने दादू पंथ की स्थापना की । नरैना (जयपुरी में दादुपंथियों की प्रधान गद्दी स्थित है ।
  • सन 1585 में फतेहपुर सीकरी की यात्रा के दौरान दादजी की अकबर से मेंट हुई । दादू दयाल जी को “राजस्थान का कबीर’ कहा जाता है ।
  • दादू पंथी जीवनभर अविवाहित रहते है । दादू पंथ के सत्संग स्थल को “बलख दरीबा कहा जाता है ।

दादुपंथी चार प्रकार के होते है –

  1. खालसा :- गरीबदास जी की आचार्य परम्परा से सम्बन्ध साधु
  2. विरक्त :- रमते-फिरते गृहस्थियों को उपदेश देने वाले साधु
  3. उत्तरादे/स्थानधारी :- जो राजस्थान को छोड़कर उत्तरी भारत में ले गये ।
  4. खाकी :- शरीर पर भरम लगाते है. एवं जटा रखते है ।

संत पीपाजी

  • इनका जन्म 1425 ईस्वी में गागरोन (झालावाड़) खींदी चौहान कड़ावा राव के घर हुआ । इनकी माता का नाम लक्ष्मीवती था । इनके बचपन का नाम प्रताप सिह था । इनके गुरू का नाम रामानन्द था । इन्होने दिल्ली के फिरोजशाह तुगलक को पराजित किया था ।
  • दर्जी सम्प्रदाय संत पीपा को अपना आराध्य देव मानते है ।
  • इन्होने राजकाज त्याग कर एक साधु का जीवन यापन किया । पीपाजी का प्रमुख मन्दिर बाडमेर जिले के समदड़ी नामक स्थान पर है।

मीरां बाई

  • मीराबाई का जन्म मेडता के कुड़की गॉव (वर्तमान में पाली जिले में स्थित) में हुआ । इनके पिता का नाम रतन सिंह य माता का नाम पीर कुँवरी था । इनका विवाह मेवाड़ के राणा सांगा के पुत्र भोजराज के साथ हुआ था | मीराबाई के जन्म का नाम पेमल था। प्रारम्भीक गुरू राजपुरोहित चम्पा जी थे । धार्मिक गुरू गजाधर गुर्जरगौड़ ब्राह्मण थे । (विवाह के बाद मीराबाई इन्हे अपने साथ मेवाड़ ले गई) ।
  • नोट:- रैदास रामायण के अनुसार मीरा की सास महारानी रतना कुमारी झालीजी के गुरू थे । रैदास को मीराबाई का गुरू भी माना जाता है।
  • मीराबाई भोज की मृत्यु के बाद कृष्ण भक्ति में लीन हो गई । मीरा ने कृष्ण को पति के रूप में वरण किया ।
  • भोजरात की मृत्यु के उपरान्त राणा विक्रमादित्य ने मीराबाई को अनेक कष्ट दुःख दिये परेशान होकर मीरांयाई मेड़ता, वृन्दापन एवं अन्त में द्वारिका चली गई । विक्रम सम्वत् 1063 में मीराबाई डाकोर स्थित रणछोड़ मन्दिर में द्वारिकाधिश की मूर्ती में विलिन हो गई।
  • मीराबाई की प्रमुख रचनाएँ गीत गोविन्द, पदावलियां, टीका रा गोविन्द, नरसी मेहता की हुन्टी, आदि ।
  • नोट-मीरांबाई के निर्देशन बृज भाषा में रतना खाती ने “नरसी जी रो मायरों’ की रचना की है । मीरां की तुलना प्रसिद्ध सुफी सन्त रबीया नामक महिला से की जाती है।

संत सुन्दर दासजी (1508 से 1707)

  • इनका जन्म 1596 में दौसा के खण्डेलवाल वैश्य परिवार में हुआ इनके पिता का नाम परमानन्द (शाह चौखा) थे ।
  • ये दादजी के शिष्य थे । इन्हे सबैया लिखने में सिद्धहस्त हासिल थी । इनका निधन 1707 में सांगानेर में हुआ । इन्होने ज्ञान समुद्र, सुन्दर सार, सुन्दर विलास (ज्ञान सवैया) ग्रन्थों की रचना की थी।
  • इन्होने दादु पंथ में नागा साधु वर्ग प्रारम्भ किया ।
  • नोट:- सुन्दर दास जी को “दुसरे शंकराचार्य के नाम से जाना जाता है ।

संत रज्जब जी

  • इनका जन्म जयपुर के सांगानेर में हुआ । विवाह के लिये जाते समय ये दादु जी के उपदेशों को सुनकर दादु जी के शिष्य बन गये एवं जीवनभर दुल्हे के देश में रहकर दाद् के उपदेशों का बखान करते रहें । इनका प्रमुख ग्रन्थ रज्जब वाणी एवं सर्वगी है।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • सन् 1415 में धुलैय गाँव (टोंक) में जन्मे संत धन्ना रामानन्द जी के शिष्य थे इन्हे 15वीं शताब्दी में राजस्थान में भक्ति आन्दोलन को प्रारम्भ करने का श्रेय जाता है ।
  • डूंगरपुर में साबला गाँव में जन्में संत मावजी ने देणेश्वर धाम की स्थापना करवाई थी । इनकी प्रमुख पीठ व मन्दिर माही नदी के तट पर साबला में स्थित है।
  • सन् 1550 में अलवर जिले के धोलीदुब गाँव में संत लाल दास जी जन्म हुआं इन्होने लालदासी सम्प्रदाय का प्रतिन किया । एवं निगुर्ण भक्ति का प्रचार किया इनकी मृत्यु नगला गाँव भरतपुर में हुआ । जबकि इनकी समाधि शेरपुर गाँव अलवर में स्थित है।
  • संत चरणदास जी जन्म सन् 1703 में डेहरा गाँव अलवर में हुआ । इनका बचपन का नाम रणजीत था । इन्होने चरणदास सम्प्रदाय का प्रवर्तन किया । इन्होने अपने अनुयायियों के लिये 42 नियमों का प्रतिपादन किया । संत चरणदास जी ने नादिरशाह के भारत पर आक्रमण की भविष्यवाणी की थी । इनकी सर्वप्रमुख पीठ दिल्ली में स्थित है।
  • डेहरा गाँव में जन्मी दया बाई व सहजो बाई संत चरण दास जी की शिष्या थी । सहजो बाई ने “सहज प्रकाश” एवं दयाबाई ने “दया बोध तथा विनय मालिका’ ग्रन्थों की रचना की ।
  • आचार्य तुलसी का जन्म 20 अक्टूम्बर 1914 को लाडनू नागौर में हुआ । इनके पिता का नाम झूमरमल एवं माता का नाम वन्दना था । आचार्य तुलसी ने नैतिक उत्थान व आध्यात्मिक मूल्यों की स्थापना हेतु “अणुव्रत’ आन्दोलन का सुत्रपात हुआ ।
  • आचार्य महाप्रज्ञ का जन्म टमखोर (झुन्झुनु) में हुआ । इस गाँव को “संतों की खान” कहा जाता है, क्योंकि अब तक इस गाँव (टमखोर) में 32 संत हो चुके है । आचार्य महाप्रज्ञे का नाम नथमल था ।
  • वर्तमान में तेरापंथी धर्म संघ के 11वें आचार्य महाश्रमण मुदित कुमार है जिनका जन्म 13 मई 1962 को सरदारशहर (चुरू) में हुआ ।

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