राजस्थान में आर्थिक नियोजन

राजस्थान में आर्थिक नियोजन

  • स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद देश के तीव्र व समग्र आर्थिक विकास के लिए आर्थिक योजनाएँ बनाने के लिए 15 मार्च, 1950 को केन्द्र सरकार द्वारा योजना आयोग (Planning Commission) की स्थापना की गई। यह एक सलाहकारी एवं गैर-सांविधिक निकाय है, जिसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है।
  • योजना आयोग देश के संसाधनों का अनुमान लगाकर कार्यों हेतु  प्राथमिकताओं का निर्धारण कर योजनाओं का निर्माण एवं उनकी प्रगति का मूल्यांकन करता है।
  • आयोग द्वारा बनाई गई योजनाओं पर राष्ट्रीय विकास परिषद् (National Development Council) में विचार विमर्श किया जाता है। राष्ट्रीय विकास परिषद का गठन केबिनेट प्रस्ताव द्वारा एक गर-सांविधिक निकाय के रूप में 6 अगस्त, 1952 को किया गया था। इसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं एवं सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, केन्द्रीय मंत्रिपरिषद् के सभी सदस्य, केन्द्र शासित प्रदेशों के प्रशासक एवं योजना आयोग के सभी सदस्य इसके पदेन सदस्य होते हैं। राष्ट्रीय विकास परिषद् द्वारा योजनाओं की स्वीकृति के पश्चात् उसे संसद में अनुमोदनार्थ भेजा जाता है।
  • राज्य स्तर पर राज्य आयोजना विभाग योजनाओं के निर्माण, नियंत्रण एवं मूल्यांकन तथा इनसे सम्बन्धित मामलों में सरकार को सलाह देने के लिए उत्तरदायी है। इस कार्य में सहायता हेतु मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में राज्य में राज्य आयोजना बोर्ड का गठन किया गया है।
  • वर्तमान में देश में 11वीं पंचवर्षीय योजना (2007-12) चल रही है।

राजस्थान की 11वीं पंचवर्षीय योजना

  • राजस्थान की 11वीं पंचवर्षीय योजना का आकार प्रचलित कीमतों पर 71731.98 करोड़ रुपये निर्धारित किया गया है, जबकि दसवीं योजना (2002-2007) का निर्धारित आकार 31831.75 करोड़ रुपये था।
  • 11वीं योजना का आकार 10वीं योजना के आकार का 2.25 गुना है। 11वीं पंचवर्षीय योजना में आर्थिक विकास की दर का लक्ष्य 7.4 प्रतिशत रखा गया है जबकि सम्पूर्ण भारत का लक्ष्य 9 प्रतिशत है।

11वीं योजना के महत्वपूर्ण लक्ष्य

क्षेत्र लक्षित वृद्धि दर
 राजस्थान भारत
कृषि क्षेत्र  3.5%   4.5%
उद्योग क्षेत्र  8.0%  10.5%
सेवाएँ  8.9% 9.9%
कुल लक्षित विकास दर 7.4%  9%

11वीं योजना की प्राथमिकताएँ

विषम भौगोलिक एवं सामाजिक संरचना तथा जनता की विकासीय आवश्यकताओं के मद्देनजर 11वीं पंचवर्षीय योजना में निम्न 6 प्राथमिकताएँ मार्गदर्शक तत्त्व के रूप में रहेंगी–

  1. निम्न जीवनयापन स्तर के कारणों, भुखमरी, कुपोषण एवं भयावह गरीबी का निवारण करना।
  2. अलाभकारी समुदाय मुख्यतः महिलाओं, वृद्धों एवं बालकों की विशेष देखभाल करना।
  3.  मानव संसाधन विकास पर जोर, सामाजिक आधारभूत संरचना व उसके अंतर को कम करना तथा कार्य क्षमता सृजन करना।
  4. लाभप्रद रोजगार मुहैया कराना, जीविकोपार्जन के स्रोतों का सृजन तथा प्राकृतिक व सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करना।
  5. सुशासन एवं वित्तीय सुधार सुनिश्चित करना।
  6. आर्थिक आधारभूत सुविधाओं का सृजन करना।

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