Climate and season of Rajasthan

राजस्थान की जलवायु और ऋतु

ऋतुओं का वर्गीकरण

जलवायु के आधार पर राज्य को तीन मुख्य (परम्परागत) ऋतुओं में बाँटा गया है—

  1. ग्रीष्म ऋतु,
  2. वर्षा ऋतु एवं
  3. शीत ऋतु

1. ग्रीष्म ऋतु

  • राज्य में ग्रीष्म ऋतु का समय मार्च से मध्य जून तक (साढ़े तीन माह) माना जाता है। इस ऋतु में सूर्य के उत्तरायण होने से तापक्रम में वृद्धि होती है। अप्रेल एवं मई के महीनों में सूर्य लम्बवत चमकता है तथा हवाएँ पश्चिम से पूर्व की ओर चलती हैं। इस दौरान उत्तरी एवं पश्चिमी राजस्थान के चूरू, बीकानेर, फलौदी, जैसलमेर, बाड़मेर आदि स्थानों का तापमान 48° से.ग्रे. से 50° से.ग्रे. तक पहुँच जाता है।
  • गर्मियों में वातावरण की शुष्कता, स्वच्छ आकाश, वनस्पति के अभाव एवं मिट्टी की बलुई प्रकृति के कारण रात्रि के तापमान अचानक गिर जाने से रातें सुहावनी हो जाती हैं। जैसलमेर जिले में सम एवं खुड़ी के धोरों में हजारों देशी एवं विदेशी पर्यटक इन सुहावनी रातों का आनन्द मधुर लोक स्वर लहरियों के साथ लेते हैं।
  • राज्य का सबसे गर्म जिला चूरू माना जाता है।
  • बलुचिस्तान के पठार से गर्मियों की ऋतु में उत्तरी एवं पश्चिमी राजस्थान में स्थानीय उष्ण पवन ‘लू’ चलती हैं। लू चलने से तापमान बढ़ जाता है। गर्मियों में स्थानीय गर्म वायु भंवर रेत भरी आंधियों का रूप ले लेते हैं। ऐसी आँधियों की वार्षिक संख्या उत्तर से दक्षिण की ओर जाने पर कम होती जाती है।
  • राज्य में सर्वाधिक आंधियाँ श्रीगंगानगर जिले में वर्ष में 27 दिन, हनुमानगढ़ में 24 दिन, बीकानेर में 15 दिन, जोधपुर, बाड़मेर एवं जैसलमेर में 12 दिन, कोटा में 5 दिन एवं झालावाड़ में 3 दिन आती हैं।
  • ग्रीष्म ऋतु में सापेक्षिक आर्द्रता 35 से 60 प्रतिशत तक रहती हैं।

2. वर्षा ऋतु

  • राज्य में वर्षा ऋतु का समय मध्य जून से सितम्बर तक माना जाता है। राजस्थान में मानसून का प्रवेश द्वार बाँसवाड़ा जिला कहलाता है (16 जून)
  • मई-जून के महीनों में सिन्ध (पाकिस्तान) एवं पश्चिमी राजस्थान में अत्यधिक गर्मी के कारण बने निम्न वायुदाब के कारण हिन्द महासागर की दक्षिणी-पश्चिमी मानसूनी पवनें आकर्षित होती है। इस मानसूनी पवनों की दोनों शाखाओं (अरब सागरीय शाखा एवं बंगाल की खाड़ी की शाखा) के मार्ग में राजस्थान आता है।
  • बंगाल की खाड़ी की मानसूनी पवनें गंगा-यमुना का मैदान पार करके जब राजस्थान पहुँचती हैं तो इनकी आर्द्रता कम रह जाती हैं अत: ये पवनें पूर्वी व दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान में कुछ वर्षा करती है लेकिन अरावली पर्वतमाला बीच में आने के कारण ये पवने राज्य के उत्तरी-पश्चिमी भाग में वर्षा नहीं कर पाती हैं।
  • अरब सागरीय मानसूनी पवनें अरावली पर्वतमाला के समानांतर चलने के कारण अवरोध के अभाव में वर्षा नहीं कर पाती है।

3. शीत ऋतु

  • राज्य में शीतऋतु का समय अक्टूबर से फरवरी तक माना जाता है। इसमें अक्टूबर से मध्य नवम्बर तक का समय मानसून प्रत्यावर्तन’ का माना जाता है, जब मानसून का लौटना होता है।
  • मानसून प्रत्यावर्तन के काल में राज्य की 10% वर्षा होती है। इस दौरान हवाएँ शान्त, हल्की एवं परिवर्तनशील रहती हैं।
  • शीतकाल में उत्तर-पश्चिमी हवाओं (भूमध्यसागरीय पश्चिमी विक्षोभों) से राज्य के उत्तरी एवं पश्चिमी भागों में होने वाली हल्की वर्षा को स्थानीय भाषा में ‘मावठ’ कहते हैं। इसका उद्गम स्थल भूमध्य सागर है।
  • जनवरी के माह में माउण्ट आबू में औसत निम्न तापमान 15° सें.ग्रे. तक रहता है।
  • राज्य में आर्द्रता सबसे कम अप्रेल में तथा सबसे अधिक अगस्त के महीने में रहती है।
  • राज्य में हवाएँ प्रायः पश्चिम एवं दक्षिण-पश्चिम की ओर चलती हैं।
  • सर्दियों में हिमालय में होने वाले हिमपात से हिमाचल प्रदेश, पंजाब एवं हरियाणा राज्यों को पार करके तेज ठण्डी हवा चलती है, जिसे ‘शीत लहर’ कहते हैं।
  • राज्य में सबसे तेज हवाएँ जून के महीने में तथा सबसे धीमी नवम्बर के महीने में चलती हैं।
  • राज्य में वायु की अधिकतम गति 140 किमी. प्रति घंटा है।
  • राज्य के पूर्वी एवं दक्षिणी-पूर्वी भागों में जून-जुलाई के महीनों में आने वाले तूफानों को ‘वज्र तूफान’ कहते हैं।

राज्य में कम वर्षा होने के मुख्य कारण

  1. ग्रीष्मकालीन मानसून की दोनों शाखाएँ अन्त में राजस्थान पहँचती हैं, अतः इनमें नमी की मात्रा बहुत कम होती है।
  2. मानसूनी पवनों के राजस्थान में प्रवेश करने पर यहाँ का उच्च तापमान एवं शुष्क वायु इन पवनों की अधिकांश नमी (आर्द्रता) को सोख लेती है।
  3. अरावली पर्वतमाला की दिशा मानसूनी पवनों के अवरोध में न होकर समानान्तर है, जिससे ये पवनें रुक कर वर्षा करने की बजाय दो भागों में विभक्त हो जाती है।
  • राजस्थान में वर्षा के वितरण में बहुत भिन्नता है, यहाँ पर अधिकांश वर्षा मध्य जून से सितम्बर की अवधि में होती है।
  • आबू पर्वत (सिरोही) राज्य में सर्वाधिक वर्षा (150 से.मी. वार्षिक) प्राप्त करता है। राजस्थान में औसत वार्षिक वर्षा 50.20 सेमी. है। तथा अजमेर जिले में राज्य के औसत के लगभग समान वर्षा होती है।
  • 50 सेमी. की समवर्षा रेखा राज्य को दो भागों में विभक्त करती  है। इस रेखा के दक्षिण पूर्व में वर्षा अधिक होती है।
  • राज्य में सर्वाधिक वर्षा वाले जिले झालावाड़ (सबसे 100 सेमी. वार्षिक) एवं बाँसवाड़ा (90 सेमी. वार्षिक) है।
  • राज्य का सुदूर पश्चिमी भाग (बाड़मेर, जैसलमेर एवं बीकानेर जिले) सबसे कम वर्षा प्राप्त करते हैं। यहाँ पर वर्षा का वार्षिक औसत लगभग 25 सेमी. है।
  • राज्य का जैसलमेर जिला सबसे कम वार्षिक वर्षा (15 सेमी.) प्राप्त करता है। न्यूनतम आर्द्रता वाला जिला बीकानेर है। ‘वार्षिक वर्षा में परिवर्तनशीलता’ मरुस्थली का एक प्रमुख लक्षण हैं।
  • राज्य में सर्वाधिक वर्षा जुलाई एवं अगस्त के महीनों में होती है। जो कुल वर्षा का लगभग 60% है।

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