भारत में शैक्षिक विकास ( Indian education system )

भारत में शैक्षिक विकास ( Indian education system )

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  • भारतवर्ष प्राचीन समय से ही शिक्षा के क्षेत्र में विश्वगुरु कहलाता था। गुरुकुल, यहाँ शिक्षा के केन्द्र थे। इन्हीं गुरुकुलों में शिक्षार्थी को वेद, उपनिषद्, व्याकरण, भाषा, गणित, ज्योतिष, धनुर्विद्या, नीतिशास्त्र इत्यादि की शिक्षा मौखिक एवं अभ्यास के आधार पर दी जाती थी। तक्षशिला, नालन्दा, विक्रमशिला, काशी, अवंति, वल्लभी इत्यादि देश शिक्षा के बृहद् केन्द्र थे, जहाँ पर आज के विश्वविद्यालयों की तरह शिक्षा प्रदान की जाती थी । ऐतिहासिक स्रोतों से जानकारी मिलती है कि चीनी यात्री ह्वेनसांग ने कई वर्षों तक नालन्दा विश्वविद्यालय में ज्ञानार्जन किया था। प्राचीन साहित्य से गार्गी, मैत्रेयी, लोपमुद्रा इत्यादि विदुषी महिलाओं के बारे में जानकारी मिलती हैं।
  • सल्तनतकाल एवं मध्यकाल में मुस्लिम शासन के दौरान भारत में इस्लामिक शिक्षा का प्रारम्भ हुआ, फलस्वरूप फारसी भाषा शिक्षा का माध्यम हो गई। हालाँकि उर्दू, बांग्ला, तमिल, तेलगु,  कन्नड़, मलयालम सहित प्रमुख क्षेत्रीय भाषाएँ भी स्थानीय स्तर पर शिक्षा का माध्यम बनी रहीं। इस काल में युद्धों की अधिकता एवं मुस्लिम आक्रांता शासकों द्वारा शिक्षाकेन्द्रों को तहस-नहस किये जाने से भारत में शिक्षा का स्तर गिर गया। प्राचीनकाल से चली आ रही आश्रम-गुरुकुल व्यवस्था एवं स्त्री शिक्षा की अधोगति हुई।
  • परवर्ती मुगलकाल में ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासनकाल के प्रारम्भ में ईसाई मिशनरियों ने बंगाल एवं पूर्वोत्तर भारत में अनेक अंग्रेजी पाठशालाएँ स्थापित की। इन पाठशालाओं ने भारत की चरमराई शिक्षा प्रणाली को पुनर्जीवन प्रदान किया। 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में इन्होंने ‘बैथून स्कूल खोले। 1781 ई. में बंगाल के गवर्नर वारेन हेस्टिंग के प्रयासों को सफल बनाया था।
  • सन् 1854 में गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी के कार्यकाल में कम्पनी के बोर्ड ऑफ कन्ट्रोल के अध्यक्ष चार्ल्स वुड की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने भारत के सम्बन्ध में अपनी नवीन शिक्षा नीति की | घोषणा की जो ‘बुस का घोषणा पत्र’ (Woods Despatch) के नाम से प्रसिद्ध है। इसे आधुनिक भारतीय शिक्षा का मैग्नाकार्टा’ कहा गया। इन प्रावधानों के क्रियान्वयन में 1857 में तीनों प्रेसीडेन्सियों कलकत्ता, बम्बई एवं मद्रास में  विश्वविद्यालयों की एवं प्रान्तों में लोक शिक्षा विभागों की स्थापना की गई।
  • वुड्स घोषणा पत्र (1854 ई.) के प्रावधानों के क्रियान्वयन का मूल्यांकन करने एवं प्राथमिक शिक्षा के विस्तार हेतु सुझाव देने के लिए 1882 ई. में गवर्नर जनरल एवं वायसराय लॉर्ड रिपन द्वारा डब्ल्यू हंटर की अध्यक्षता में हंटर शिक्षा आयोग का गठन किया गया। आयोग ने हाई स्कूलों में साहित्यिक एवं व्यावसायिक शिक्षा प्रदान करने, शिक्षा के क्षेत्र में निजी प्रयासों को प्रोत्साहित करने व उच्च शिक्षा संस्थाओं के प्रबन्ध से सरकार को अलग रहने आदि सुझाव दिये । इसके पश्चात् भारत में शिक्षा के क्षेत्र में निजी शिक्षा संस्थाओं का योगदान महत्त्वपूर्ण हो गया।
  • 1904 में लॉर्ड कर्जन द्वारा रैले कमीशन की सिफारिशों के अनुरूप भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम (Indian Universities Act) पारित कर विश्वविद्यालयों पर सरकारी नियंत्रण कड़ा कर दिया गया जिसका भारतीयों द्वारा कड़ा विरोध किया गया।
  • 1912 में रविन्द्रनाथ टैगोर द्वारा कलकत्ता के समीप बोलपुर में ‘विश्व भारती’ की स्थापना की गई।सन् 1917 में सर माइकल सैडलर की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय आयोग की नियुक्ति की गई जिसके सुझावों के  आधार पर नये विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई।
  • 1937 में महात्मा गाँधी ने वर्धा (महाराष्ट्र) से अपने समाचार पत्र | ‘हरिजन’ में ‘बुनियादी शिक्षा पर लेखों की एक श्रृंखला  प्रकाशित की जिसके आधार पर जाकिर हुसैन समिति की सिफारिशों पर वर्धा बुनियादी शिक्षा’ (नई तालीम) योजना बनाई गई, जिसमें सामुदायिक विकास से सम्बन्धित तथा बालकों को उत्पादक कार्यों में लगाने वाली शिक्षा को अधिक महत्त्व दिया गया।
  • स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् 1948 ई. में भारत सरकार ने प्रसिद्ध  शिक्षाविद् डॉ. राधाकृष्णन् की अध्यक्षता में गठित आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1956 में संसद के अधिनियम द्वारा ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ गठित किया।
  • भारतीय संविधान के उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए भारत सरक ने राजस्थान के प्रसिद्ध शिक्षाविद् डॉ. दौलतसिंह कोठारी अध्यक्षता में जुलाई, 1964 में गठित कोठारी आयोग की सिफारिशों पर 1968 में देश की प्रथम शिक्षा नीति घोषित की। 1986 में राजीव गाँधी सरकार द्वारा द्वितीय राष्ट्रीय शिक्षा नीति जारी की गई।
  • शिक्षा के विषय को 1976 ई. में 42वें संविधान संशोधन द्वारा राज्य सूची से हटाकर समवर्ती सूची में शामिल किया गया है।
  • भारतीय संसद द्वारा 1 दिसम्बर, 2002 को 14 वर्ष तक के बच्चों हेतु निःशुल्क व अनिवार्य शिक्षा के अधिकार को मूल अधिकार’ बनाने एवं इन बच्चों को शिक्षा के अवसर मुहैया कराने | को माता-पिता/अभिभावक का मूल कर्तव्य बनाने हेतु 86वाँ संशोधन अधिनियम, 2002 पारित किया गया। यह अधिनियम 1 अप्रेल 2010 से प्रभावी हुआ।
  • हमारे देश में स्वतंत्रता के पश्चात् शिक्षा के विकास एवं सार्वजनीकरण की दिशा में विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से किए जा रहे अनवरत प्रयासों के फलस्वरूप देश की साक्षरता विगत 50 वर्षों में 18.33% (1951) से बढ़कर वर्ष 2001 में 64.8% हो गई है तथा देश के 75.3% पुरुष तथा 53.7% महिलाएँ साक्षर हो चुकी हैं।

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