Organic Evolution ( jaiv vikaas kya hai )

जैव विकास (Organic Evolution)

  • प्राणियों में व्यक्तिगत एवं जाति स्तर पर होने वाले परिवर्तनों के परिणाम स्वरूप सरल जीवों से जटिल जीवों के विकास की प्रक्रिया एवं घटना जैव विकास (Organic Evolution) कहलाता है।
  • कोयसरवेट के रूप में जीवन की उत्पत्ति के पश्चात से अभी तक जीवन में जितनी जटिलाएं आ चुकी हैं. यह विकास यात्रा का पूरा पथ जैव-विकास कहलाता है। जिस प्रकार जीवन की उत्पत्ति के संदर्भ में अनेक सिद्धान्त हैं, उसी प्रकार जीवन के विकास के संदर्भ में भी अनेक मत दिये गए हैं, और नकारे गए .

जैव विकास से संबंधित विभिन सिद्धान्त (Different concepts related toOrganic Evolution)

1.  लैमार्कवाद (Lamarckism)

  • लैमार्क फ्रांसीसी वैज्ञानिक थे। लैमार्क ने अपनी पुस्तक “फिलासॉफी जूलोजिक” (Philosophie Zoologique). में जैव-विकास के संदर्भ में अपना मत रखा। लैमार्क के जैव-विज्ञान के सिद्धान्त को मुख्य रूप से उपार्जित लक्षणों को वंशागति के रूप में जाना जाता है, परंतु उनके सिद्धान्त में उन्होंने जीवन के विकास पर तीन कारकों के प्रभाव पर महत्व दिया !

(1) वातावरण का प्रभाव (Effect of Environment):

  • इसके अनुसार वातावरण जीवों के बाह्य, आंतरिक कार्यिकी लक्षणों में अपना प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभाव डालता है। लैमार्क के अनुसार प्राणियों के शरीर में उनके वातावरण के कारण बहुत से परिवर्तन आते हैं, अर्थात् जीव के आस-पास का पर्यावरण निर्धारित करता है कि उस जीव में कौन-कौन से गुण होंगे। लैमार्क ने अपने प्रयोग को जिराफ का उदाहरण देकर समझाया. उन्होंने कहा कि वातावरण में जब कम ऊंचाई पर पत्तियाँ उपलब्ध थी तब जिराफ को भोजन के लिए गर्दन ऊंची करने की आवश्यकता नहीं थी. इसलिए उसकी गर्दन पहले छोटी हुआ करती है, परंतु वातावरणिक परिवर्तनों के कारण जब पत्तियो की ऊंचाई बढ़ने लगी तय जिराफ की गर्दन भी आवश्यकतानुसार लंबी होने लगी !


(2) अंगों के उपयोग एवं अनुपयोग (Use and unuse of organs):

  • इससे संदर्भ में लैमार्क ने बताया कि वातावरण में परिवर्तन के साथ जीव अपने कुछ अंगों का अधिक प्रयोग करता है, और कुछ अंगों का कम प्रयोग करता है। जिन अंगों का यह अधिक प्रयोग करता है, वह समय के साथ विकसित होने लगते हैं, और जो अंग अधिक प्रयोग नहीं किये जाते वे समय के साथ समाप्त होने लगते हैं। अवशेषी अंगों को लैमार्क के इस सिद्धान्त के आधार पर समझा जा सकता है। उदाहरण के तौर पर मनुष्य के शरीर में उपस्थित वर्मीफार्म अपेन्डिक्स अब अवशेषी अंग हो गया है। पहले जब आग का आविष्कार नहीं हुआ था और मनुष्य कच्चे पौधे एवं माँस से अपना पेट भरता था तब अपेन्डिक्स क्रियाशील हुआ करता था परंतु बाद में इसके प्रयोग में कमी आई और यह अवशेषी अंग हो गया। दाँये हाथ से काम करने वाले लोहार के दाये और बाँये हाथ की ताकत में अंतर होता है. इससे भी लैमार्क के इस सिद्धान्त को समझा जा सकता है।

(3) उपार्जित लक्षणों की वंशागति (Inheritance OfAcquired Characters) :

  • इसके अनुसार वे लक्षण जो बदलते वातावरण के अनुसार अधिक अनुकूलित होते हैं, अगली पीढ़ी में स्थानान्तरित हो जाते हैं। लैमार्क के अनुसार उत्तम लक्षणों के इस सतत हस्तान्तरण के कारण भावी पीढ़ी अपने पर्वज पीढी से भिन्न होती चली जाती है और अंततः नयी जाति का उद्भव हो जाता है।
  • लैमार्क का सिद्धान्त प्रथम दृष्टया तर्क संगत लगता है. किन्तु इसमें कुछ त्रुटियाँ हैं। वातावरणिक दशाएं यदि जीव के शरीर में इतना अधिक परिवर्तन ला सकती (जिराफ की गर्दन का इतना लंबा हो जाना) तो पृथ्वी पर से जीव विलुप्त नहीं होते, सभी जीव वातावरणिक दशाओं के अनुसार स्वयं को अनुकूलित कर लेते और अपने अंगों एवं क्रियाविधियों में कुछ परिवर्तनों के साथ वे अस्तित्व में बने रहते परंतु हम जानते हैं कि डायनासोर जैसे कुछ जीव विलुप्त हो चुके हैं। उपार्जित लक्षणों की वंशागति भी गलत साबित होती है. क्योंकि यदि परिवर्तन वातावरणिक दशाओं से आया तो यह अगली पीढ़ी में कैसे स्थानान्तरित हो गया, वैसे भी लोहार का बच्चा जन्म से ही मजबूत दाहिने हाथ के साथ पैदा नहीं होता, जो यह सिद्ध करता है कि वातावरिणक दशाओं के कारण आये परिवर्तन वंशागत नहीं हो सकते।

2.  डार्विनवाद (Darwinism)

  • डार्विन ब्रिटेन के वैज्ञानिक थे। डार्विन “प्राकृतिक वरण द्वारा नयी जातियों का उद्भव” (Origin of Species by NaturalSelection) के रचियता हैं। अपनी इसी किताब में इन्होंने अपना प्राकृतिक वरण (Natural selection) का सिद्धान्त दिया। डार्विन के सिद्धान्त के मूल बिन्दु में यह बात निहित थी कि प्रकृति जीवों में गुणों को बदलती नहीं, बल्कि विभिन्न गुणों में से उत्तम गुणो का चयन कर लेती है, और शेष गुण जीवन संघर्ष में विफल होकर समाप्त हो जाते हैं।
  • जिस जिराफ की लंबी गर्दन की व्याख्या करके तैमार्क ने अपने वातावरणिक प्रभाव के तथ्य को सिद्ध करने का प्रयास किया उस जिराफ की व्याख्या डार्विन दूसरे रूप में करते हैं। डार्विन के अनुसार प्रकृति में लंबे और छोटे दोनों तरह की गर्दन वाले जिराफ पहले से ही उपस्थित थे। जैसे-जैसे वातावरणिक दशाएं बदली और कम ऊंचाई वाली पत्तियाँ समाप्त हो गई. छोटी गर्दन वाले जिराफ भोजन के संघर्ष में बड़ी गर्दन वाले जिराफ से पिछड़ गए और समाप्त हो गए. इस प्रकार प्रकृति ने बड़ी गर्दन वाले जिराफ का चयन कर लिया।

डार्विन के प्राकृतिक वरण के सिद्धान्त को निम्न शीर्षकों में समझा जा सकता है

(1) प्रचुर मात्रा में जीवों द्वारा संतानोत्पत्ति :

  • पृथ्वी पर रहने वाले विविध जीव अपने जीवन-काल में कई हजार बच्चों को जन्म देते हैं, यदि ये सभी जीव जीवित रह गए तो पृथ्वी पर इन जीवों की भरमार हो जाएगी और पृथ्वी इन जीवों से पूरी तरह भर जाएगी, इसलिए प्राकृतिक वरण के अंतर्गत कुछ जीव जन्म के साथ ही विविध तरीकों से मर जाते हैं।

(2) जीवित जीवों के बीच संघर्ष :

  • जीवों के बीच जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं के लिए संघर्ष गर्भावस्था से ही प्रारंभ हो जाता है। यह संघर्ष उनकी मृत्यु तक कभी आवास के लिए. कभी भोजन के लिए, कभी संगत के लिए चलता रहता है। इस संघर्ष में भी कुछ जीव हार जाते हैं, और समाप्त हो जाते हैं। जीवों के बीच होने वाला संघर्ष तीन प्रकार का होता है

(a) अन्तराजातीय संघर्ष (Intra specific) :

  • यह संघर्ष एक ही जाति के सदस्यों के बीच होता है, यह संघर्ष मुख्य रूप से संगत एवं भोजन के लिए होता है।

(b) अन्तर्जातीय संघर्ष (Inter Specific) :

  • यह संघर्ष भिन्न जाति के जीवों के बीच होता है, यह संघर्ष मुख्य रूप से भोजन, आवास एवं वर्चस्व के लिए होता है।

(c) वातावरणीय संघर्ष (Environmental) :

  • यह संघर्ष जीव का उसके वातावरण में होने वाले परिवर्तन से होता है, जैसे बाढ़, सूखा, अकाल, भूकम्प आदि।

3. योग्यतम की उत्तरजीविता (Survival of the fittest) :

  • इसके अनुसार वह जीव जो इन सभी तरह के संघर्षों में जीतता है, वही जीव प्रकृति में अस्तित्व रख पाता है, शेष सभी जीव समाप्त हो जाते हैं। यह प्राकृतिक वरण के द्वारा होता है। और संघर्ष में सफल यह जीव अपनी अगली पीढ़ी में अपने गुणो को स्थानान्तरित करता जाता है। ___ डार्विन का प्राकृतिक वरण का सिद्धान्त सभी मायनों में सही था, उन्होंने सभी प्रश्नों का सही हल दिया परंतु डार्विन इस बात का उत्तर नहीं दे पाये कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में गुणों का हस्तान्तरण होता कैसे है? यह डार्विन के सिद्धान्त का दोष नहीं था, डार्विन तब तक मात्र मेण्डल के आनुवांशिका के नियम से अनभिज्ञ थे और उन्हें आनुवांशिक लक्षणों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, मेण्डल द्वारा आनुवांशिकता के नियम को खोजे जाने के बाद डार्विन के सिद्धान्त पर उठने वाला प्रश्नचिह्न स्वतः ही समाप्त हो गया।

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